49 मिट्टी (Mitti) Best Notes

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मिट्टी (Mitti)

मिट्टी (Mitti) :- विश्व में मिट्टी अनेक प्रकार की पाई जाती है । कहीं मुल्तानी मिट्टी, कांप मिट्टी, दोमट मिट्टी आदि पाई जाती है ।

रेतीली मिट्टी (Retili Mitti)

• इसे बलुई मिट्टी भी कहते है ।
• इसे मरूस्थलीय मिट्टी भी कहा जाता है ।
• राजस्थान के सर्वाधिक क्षेत्र में पाई जाती है ।
• यह मिट्टी सर्वाधिक पश्चिमी क्षेत्र में पाई जाती है ।
• यह मोटे कण वाली मिट्टी होती है ।
• यह जैसलमेर, बाड़मेर, जोधपुर, पाली, चुरू, सीकर और नागौर आदि क्षेत्र में पाई जाती है ।
• इस क्षेत्र में पालीवाल ब्रह्मणों द्वारा खण्डीन कृषि की जाती है ।

भूरी रेतीली मिट्टी (Bhuri Retili Mitti)

• इसे सीरोजम मिट्टी तथा घुसर मिट्टी भी कहते हैं ।
• यह अरावली के पश्चिम क्षेत्र में पाई जाती है ।
• जोधपुर, नागौर, जालौर सीकर, झुन्झुनूँ, चुरू आदि क्षेत्र में पाई जाती है ।
• भूरी रेतीली मिट्टी दलहन की खेती के लिए प्रसिद्ध है ।

भूरी मिट्टी (Bhuri Mitti)

• भूरी मिट्टी बनास नदी के प्रवाह क्षेत्र में पाई जाती है ।
• यह मिट्टी अजमेर, सवाई माधोपुर, भीलवाड़ा व टोंक में पाई जाती है ।
• यह मिट्टी जायद की फसल के लिए प्रसिद्ध है ।

दोमट मिट्टी (Domat Mitti)

• इसे कच्छारी मिट्टी, कांप मिट्टी, ब्लैक कॉटन सॉयल मिट्टी भी कहते है ।
• यह मिट्टी जयपुर, दौसा, भरतपुर, सवाई माधोपुर, करौली, अलवर आदि क्षेत्र में पाई जाती है ।
• यह सबसे उपजाऊ मिट्टी है ।
• इस मिट्टी में गेहूँ, सरसों चावल आदि की मुख्य रूप से खेती होती है ।
• छप्पन के मैदांचे में कॉप मिट्टी (दोमट) पाई जाती है ।

काली मिट्टी (Kali Mitti)

• काली मिट्टी राजस्थान के हाडौती क्षेत्र (दक्षिणी पूर्वी) में पाई जाती है ।
• कोटा, बुंदी, बारां, झालावाड़ में पाई जाती है ।
• कपास के लिए उपयुक्त मिट्टी है ।
• संतरा और सोयाबीन के उत्पादन के लिए प्रसिद्ध मिट्टी है ।
• इसे रेगुर मिट्टी भी कहते हैं ।

पर्वतीय / पथरीली मिट्टी (Parvtiy Mitti / Pathrili Mitti)

• पथरीली मिट्टी अरावली के ढलानों में पाई जाती है ।
• यह मिट्टी मुख्य रूप से उदयपुर सिरोही, पाली, अजमेर, अलवर, सीकर आदि क्षेत्रों में पाई जाती है ।

लवणीय मिट्टी (Lavniy Mitti)

• लवणीय मिट्टी में सोडियम क्लोराइड की मात्रा अधिक होती है ।
• यह मिट्टी गंगानगर, बीकानेर, जालौर, आदि क्षेत्र में पाई जाती है ।

मिश्रित लाल – पीली मिट्टी (Mishrit Lal Pili Mitti)

• यह मिट्टी सवाई माधोपुर, करौली, टोंक, भीलवाड़ा में पाई जाती है ।
• इस मिट्टी में लौह ऑक्साइड की मात्रा अधिक होती है ।

मिश्रित लाल – काली मिट्टी (Mishrit Lal Kali Mitti)

• यह डूँगरपुर, उदयपुर, बाँसवाड़ा, भीलवाड़ा आदि क्षेत्र में पाई जाती है ।
• यह मिट्टी सभी फसलों के लिए उपयुक्त मानी जाती है ।

लाल दोमट मिट्टी (Lal Domat Mitti)

• यह उदयपुर, डूँगरपुर, बाँसवाड़ा, भीलवाडा, चितौड़गढ़ आदि क्षेत्र में पाई जाती है ।
• मक्का के लिए सबसे उपयुक्त मिट्टी है ।

P.H. के आधार पर मिट्टी (P.H. ke Adhar Par Mitti)

उदासीन मिट्टी (Udasin Mitti)

• उदासीन मिट्टी का P.H. मान 7 होता है ।
• उदासीन मिट्टी उपजाऊ मिट्टी होती है ।

क्षारीय मिट्टी (Kshariy Mitti)

• क्षारीय मिट्टी का P.H. मान 7 से ज्यादा होता है ।
• क्षारीय मिट्टी के उपचार के लिए जिप्सम का प्रयोग किया जाता है तथा उड़द बोई जाती है ।

अम्लीय मिट्टी (Amliy Mitti)

• अम्लीय मिट्टी का P.H का मान 7 से कम होता है ।
• इस मिट्टी के उपचार के लिए चूना, फारफोरस तथा जाने का प्रयोग किया जाता है ।

मृदा अपरदन (Mrida Apradan)

• मृदा अपरदन को कृषि का क्षय रोग कहते है ।
• मृदा अपरदन को कृषि का प्रथम शत्रु कहा जाता है ।
• मृदा अपरदन को मिट्टी की रेंगती हुई मृत्यु कहते है ।
• मृदा अपरदन से मिट्टी की ह्यमूस क्षमता (उर्वरकता) कम हो जाती है ।

वायु अपरदन (Vayu Apradan)

• राजस्थान में सर्वाधिक अपरदन वायु अपरदन होता है ।
• सर्वाधिक वायु अपदन जैसलमेर में होता है ।
• न्यूनतम वायु अपरदन धौलपुर में होता है ।
• वायु अपरदन को रोकने के लिए सबबुल व खेजड़ी के वृक्ष लगाये जाते है ।

जल अपरदन (Jal Apradan)

• जल अपरदन को अवनालिका अपरदन भी कहते है ।
• सर्वाधिक जल अपरदन चम्बल नदी से होता है ।
• सर्वाधिक जल अपरदन कोटा में होता है ।

नाली अपरदन (Nali Apradan)

• नाली अपरदन सबसे हानिकारक अपरदन है ।
• यह कोटा, करौली, धौलपुर व सवाई माधोपुर में होता है ।

चादरी अपरदन (Chadri Apradan)

• पहाड़ी ढ़हलानों पर नदियों द्वारा होने वाला मृदा अपरदन चादरी अपरदन कहलाता है ।
• यह सिरोही और राजसमन्द में होता है ।

सेम समस्या (Sem Samsya)

• भूमि का दलदल होना सेम समस्या कहलाता है ।
• यह समस्या इन्दिरा गाँधी सिंचित क्षेत्र में पाई जाती है ।
• हनुमानगढ़ और गंगानगर में यह समस्या पाई जाती है ।
• सेम समस्या को दूर करने के लिए सफेदा (यूकेल्पिटस) के वृक्ष का प्रयोग किया जाता है ।

मृदा परीक्षण प्रयोगशालाएँ (Mrida Parikshan Prayogshalaen)

• मृदा परीक्षण प्रयोगशालाएँ जोधपुर और जयपुर में है ।
• केन्द्रीय भू संरक्षण बोर्ड जयपुर और सीकर में है ।
• कृषि विभाग ने मृदा को 14 भागों में बाँटा है ।
• सर्वाधिक बेकार भूमि जैसलमेर में है ।
• सर्वाधिक उपजाऊ भूमि गंगानगर में है ।
• सर्वाधिक व्यर्थ पठारी भूमि राजसमन्द में है ।
• सर्वाधिक परती भूमि जोधपुर में है ।

Q. राजस्थान की मिट्टी P.H. के आधार पर कितने प्रकार में बाँटा गया है ?

Answer – राजस्थान की मिट्टी P.H. के आधार पर तीन प्रकार में बाँटा गया है – 1. उदासीन मिट्टी 2. क्षारीय मिट्टी 3. अम्लीय मिट्टी ।

Q. किस मिट्टी को बलुई मिट्टी और मरूस्थलीय मिट्टी भी कहते है ?

Answer – रेतीली मिट्टी को बलुई मिट्टी और मरूस्थलीय मिट्टी भी कहते है ।

Q. कहाँ सर्वाधिक व्यर्थ पठारी भूमि पाई जाती है ?

Answer – सर्वाधिक व्यर्थ पठारी भूमि राजसमन्द में है ।

Q. कृषि विभाग ने मृदा को कितने भागों में बाँटा है ?

Answer – कृषि विभाग ने मृदा को 14 भागों में बाँटा है ।

Q. Why use “Forest Essentials Facial Ubtan Multani Mitti”?

Answer – Ideal for acne-prone skin, the Facial Ubtan Multani Mitti is an anti-bacterial purifying blend that clarifies active acne, corrects imbalances, and neutralises the skin tone.
Ubtans are 100% natural cleansers that have been used for centuries in India, to achieve clear and radiant skin. The Facial Ubtan Multani Mitti deeply cleanses the skin, purifies pores, and stimulates the skin’s underlying tissues. Through its revitalizing, refreshing and refining properties, this Ubtan clarifies the skin for a healthy complexion and smooth texture.
Regular use helps tighten open pores and effectively prevents acne and blemishes.

Q. Multani Mitti Forest Essentials” Is it natural?

Answer :- Ubtans are 100% natural cleansers that have been used for centuries in India, to achieve clear and radiant skin.

Q. What Makes “Forest Essentials Multani Mitti” Special?

Answer:- Our Ubtans are hand pounded and blended with sun-dried ingredients including fresh fruit, roots, flowers, lentils, bark, nuts and herbs, picked at optimal potency, as specified in ancient Ayurvedic scriptures. Made in very small batches to retain maximum freshness and ensure the finest quality. These traditional cleansers gently exfoliate the dead skin cells without stripping away its natural moisture to leave the skin feeling soft and supple.
While the Ubtans can be used as daily cleansers, these can also be customised to cater to your unique concerns. The Ubtans double up as masques that you can apply and leave on for 10 to 15 minutes or these can also be used as exfoliators that can be massaged to scrub off the dead skin cells.

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